Top 20 Shrimad Bhagvad Gita Slokas in Hindi With Meanings

Top 20 Shrimad Bhagavad Gita Slokas in Hindi With Meanings

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Picture of Shrikrishna and Arjun from Bhagwat Gita

Many people search for Bhagavad Gita Slokas in Sanskrit or Hindi. But they want Bhagvat Gita Slokas with Meaning of them. So here you got them with meanings. And here you will get Bhagvat Gita Slokas pronunciation.

So let’s start Top 20 Best Shrimad Bhagvad Gita Slokas in Hindi With Meanings.

  1. हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥5

भावार्थ: निः संदेह कोई मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता क्योकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है|

  1. एतां विभूतिं योगं मम यो वेत्ति तत्त्वतः सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः 7

भावार्थ: जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।

  1. तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा 23

भावार्थ: जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है ।

  1. बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः 4-5

भावार्थ: निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं ।

Picture of Shrikrishna and Arjun from Bhagwat Gita

  1. प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्29

भावार्थ: प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।

  1. अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः 3

भावार्थ: श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है ।

  1. एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम 3

भावार्थ: हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ ।

  1. आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी। तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं वान्छति शोचति॥

भावार्थ: संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक ।

  1. नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:

चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुत

भावार्थ: आत्मा को न शस्त्र  काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)

  1. परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

भावार्थ: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए… और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

Picture of Shri krishna and Arjun from Bhagwat Gita

  1. यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:

यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।

  1. यो मामजमनादिं वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌

असम्मूढः मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते

भावार्थ: जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है|

  1. एतां विभूतिं योगं मम यो वेत्ति तत्त्वतः

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः

भावार्थ: जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है|

  1. कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌

भावार्थ: श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है ।

  1. नादत्ते कस्यचित्पापं चैव सुकृतं विभुः अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः 15

भावार्थ: सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं ।

  1. लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥25

भावार्थ: जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।

Picture of Shrikrishna and Arjun from Bhagwat Gita

  1. कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् केषु केषु भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया 17

भावार्थ: हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?

  1. तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता

भावार्थ: हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥11॥

  1. मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति रमन्ति

भावार्थ: निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं॥9॥

  1. महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः 25

भावार्थ: मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ ।

Conclusion

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